Book 2 • Chapter 102
Section 102
10 verses
Verse 1
उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता सीयराम गुह लखन समेता
Verse 2
केवट उतरि दंडवत कीन्हा प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा
Verse 3
पिय हिय की सिय जाननिहारी मनि मुदरी मन मुदित उतारी
Verse 4
कहेउ कृपाल लेहि उतराई केवट चरन गहे अकुलाई
Verse 5
नाथ आजु मैं काह न पावा मिटे दोष दुख दारिद दावा
Verse 6
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी
Verse 7
अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें दीनदयाल अनुग्रह तोरें
Verse 8
फिरती बार मोहि जे देबा सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा
Verse 9
बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ
Verse 10
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ
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