Book 2 • Chapter 103
Section 103
10 verses
Verse 1
तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा पूजि पारथिव नायउ माथा
Verse 2
सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी मातु मनोरथ पुरउबि मोरी
Verse 3
पति देवर संग कुसल बहोरी आइ करौं जेहिं पूजा तोरी
Verse 4
सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी भइ तब बिमल बारि बर बानी
Verse 5
सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही तव प्रभाउ जग बिदित न केही
Verse 6
लोकप होहिं बिलोकत तोरें तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें
Verse 7
तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई
Verse 8
तदपि देबि मैं देबि असीसा सफल होपन हित निज बागीसा
Verse 9
प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ
Verse 10
पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ
0:000:00
Speed: