Book 2 • Chapter 110
Section 110
10 verses
Verse 1
सुनत तीरवासी नर नारी धाए निज निज काज बिसारी
Verse 2
लखन राम सिय सुन्दरताई देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई
Verse 3
अति लालसा बसहिं मन माहीं नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं
Verse 4
जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने
Verse 5
सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई बनहि चले पितु आयसु पाई
Verse 6
सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं
Verse 7
तेहि अवसर एक तापसु आवा तेजपुंज लघुबयस सुहावा
Verse 8
कवि अलखित गति बेषु बिरागी मन क्रम बचन राम अनुरागी
Verse 9
सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि
Verse 10
परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि
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