Book 2 • Chapter 111
Section 111
10 verses
Verse 1
राम सप्रेम पुलकि उर लावा परम रंक जनु पारसु पावा
Verse 2
मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ मिलत धरे तन कह सबु कोऊ
Verse 3
बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा
Verse 4
पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा
Verse 5
कीन्ह निषाद दंडवत तेही मिलेउ मुदित लखि राम सनेही
Verse 6
पिअत नयन पुट रूपु पियूषा मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा
Verse 7
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे जिन्ह पठए बन बालक ऐसे
Verse 8
राम लखन सिय रूपु निहारी होहिं सनेह बिकल नर नारी
Verse 9
तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह
Verse 10
राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह
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