Book 2 • Chapter 113
Section 113
10 verses
Verse 1
जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं
Verse 2
केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए धन्य पुन्यमय परम सुहाए
Verse 3
जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं तिन्ह समान अमरावति नाहीं
Verse 4
पुन्यपुंज मग निकट निवासी तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी
Verse 5
जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि सीता लखन सहित घनस्यामहि
Verse 6
जे सर सरित राम अवगाहहिं तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं
Verse 7
जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई करहिं कलपतरु तासु बड़ाई
Verse 8
परसि राम पद पदुम परागा मानति भूमि भूरि निज भागा
Verse 9
छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं
Verse 10
देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं
0:000:00
Speed: