Book 2 • Chapter 115
Section 115
10 verses
Verse 1
एक कलस भरि आनहिं पानी अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी
Verse 2
सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी राम कृपाल सुसील बिसेषी
Verse 3
जानी श्रमित सीय मन माहीं घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं
Verse 4
मुदित नारि नर देखहिं सोभा रूप अनूप नयन मनु लोभा
Verse 5
एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा रामचंद्र मुख चंद चकोरा
Verse 6
तरुन तमाल बरन तनु सोहा देखत कोटि मदन मनु मोहा
Verse 7
दामिनि बरन लखन सुठि नीके नख सिख सुभग भावते जी के
Verse 8
मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा
Verse 9
जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल
Verse 10
सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल
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