Book 2 • Chapter 116
Section 116
10 verses
Verse 1
बरनि न जाइ मनोहर जोरी सोभा बहुत थोरि मति मोरी
Verse 2
राम लखन सिय सुंदरताई सब चितवहिं चित मन मति लाई
Verse 3
थके नारि नर प्रेम पिआसे मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से
Verse 4
सीय समीप ग्रामतिय जाहीं पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं
Verse 5
बार बार सब लागहिं पाएँ कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ
Verse 6
राजकुमारि बिनय हम करहीं तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं
Verse 7
स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी बिलगु न मानब जानि गवाँरी
Verse 8
राजकुअँर दोउ सहज सलोने इन्ह तें लही दुति मरकत सोने
Verse 9
स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन
Verse 10
सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन
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