Book 2 • Chapter 117
Section 117
10 verses
Verse 1
कोटि मनोज लजावनिहारे सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे
Verse 2
सुनि सनेहमय मंजुल बानी सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी
Verse 3
तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी
Verse 4
सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी बोली मधुर बचन पिकबयनी
Verse 5
सहज सुभाय सुभग तन गोरे नामु लखनु लघु देवर मोरे
Verse 6
बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी
Verse 7
खंजन मंजु तिरीछे नयननि निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि
Verse 8
भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं
Verse 9
अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस
Verse 10
सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस
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