Book 2 • Chapter 118
Section 118
10 verses
Verse 1
पारबती सम पतिप्रिय होहू देबि न हम पर छाड़ब छोहू
Verse 2
पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी
Verse 3
दरसनु देब जानि निज दासी लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी
Verse 4
मधुर बचन कहि कहि परितोषीं जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं
Verse 5
तबहिं लखन रघुबर रुख जानी पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी
Verse 6
सुनत नारि नर भए दुखारी पुलकित गात बिलोचन बारी
Verse 7
मिटा मोदु मन भए मलीने बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने
Verse 8
समुझि करम गति धीरजु कीन्हा सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा
Verse 9
लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ
Verse 10
फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ
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