Book 2 • Chapter 121
Section 121
10 verses
Verse 1
नारि सनेह बिकल बस होहीं चकई साँझ समय जनु सोहीं
Verse 2
मृदु पद कमल कठिन मगु जानी गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी
Verse 3
परसत मृदुल चरन अरुनारे सकुचति महि जिमि हृदय हमारे
Verse 4
जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा कस न सुमनमय मारगु कीन्हा
Verse 5
जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं
Verse 6
जे नर नारि न अवसर आए तिन्ह सिय रामु न देखन पाए
Verse 7
सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई अब लगि गए कहाँ लगि भाई
Verse 8
समरथ धाइ बिलोकहिं जाई प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई
Verse 9
अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं
Verse 10
होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं
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