Book 2 • Chapter 123
Section 123
10 verses
Verse 1
आगे रामु लखनु बने पाछें तापस बेष बिराजत काछें
Verse 2
उभय बीच सिय सोहति कैसे ब्रह्म जीव बिच माया जैसे
Verse 3
बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई जनु मधु मदन मध्य रति लसई
Verse 4
उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही
Verse 5
प्रभु पद रेख बीच बिच सीता धरति चरन मग चलति सभीता
Verse 6
सीय राम पद अंक बराएँ लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ
Verse 7
राम लखन सिय प्रीति सुहाई बचन अगोचर किमि कहि जाई
Verse 8
खग मृग मगन देखि छबि होहीं लिए चोरि चित राम बटोहीं
Verse 9
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ
Verse 10
भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ
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