Book 2 • Chapter 128
Section 128
10 verses
Verse 1
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने
Verse 2
बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी बानी मधुर अमिअ रस बोरी
Verse 3
सुनहु राम अब कहउँ निकेता जहाँ बसहु सिय लखन समेता
Verse 4
जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना
Verse 5
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे
Verse 6
लोचन चातक जिन्ह करि राखे रहहिं दरस जलधर अभिलाषे
Verse 7
निदरहिं सरित सिंधु सर भारी रूप बिंदु जल होहिं सुखारी
Verse 8
तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक बसहु बंधु सिय सह रघुनायक
Verse 9
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु
Verse 10
मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु
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