Book 2 • Chapter 130
Section 130
10 verses
Verse 1
काम कोह मद मान न मोहा लोभ न छोभ न राग न द्रोहा
Verse 2
जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया
Verse 3
सब के प्रिय सब के हितकारी दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी
Verse 4
कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी जागत सोवत सरन तुम्हारी
Verse 5
तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं राम बसहु तिन्ह के मन माहीं
Verse 6
जननी सम जानहिं परनारी धनु पराव बिष तें बिष भारी
Verse 7
जे हरषहिं पर संपति देखी दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी
Verse 8
जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे
Verse 9
स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात
Verse 10
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात
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