Book 2 • Chapter 131
Section 131
10 verses
Verse 1
अवगुन तजि सब के गुन गहहीं बिप्र धेनु हित संकट सहहीं
Verse 2
नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका
Verse 3
गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा
Verse 4
राम भगत प्रिय लागहिं जेही तेहि उर बसहु सहित बैदेही
Verse 5
जाति पाँति धनु धरम बड़ाई प्रिय परिवार सदन सुखदाई
Verse 6
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई
Verse 7
सरगु नरकु अपबरगु समाना जहँ तहँ देख धरें धनु बाना
Verse 8
करम बचन मन राउर चेरा राम करहु तेहि कें उर डेरा
Verse 9
जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु
Verse 10
बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु
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