Book 2 • Chapter 141
Section 141
10 verses
Verse 1
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं
Verse 2
कहहिं पुरातन कथा कहानी सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी
Verse 3
जब जब रामु अवध सुधि करहीं तब तब बारि बिलोचन भरहीं
Verse 4
सुमिरि मातु पितु परिजन भाई भरत सनेहु सीलु सेवकाई
Verse 5
कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी
Verse 6
लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं
Verse 7
प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु धीर कृपाल भगत उर चंदनु
Verse 8
लगे कहन कछु कथा पुनीता सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता
Verse 9
रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत
Verse 10
जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत
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