Book 2 • Chapter 144
Section 144
10 verses
Verse 1
गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई
Verse 2
चले अवध लेइ रथहि निषादा होहि छनहिं छन मगन बिषादा
Verse 3
सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना धिग जीवन रघुबीर बिहीना
Verse 4
रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू
Verse 5
भए अजस अघ भाजन प्राना कवन हेतु नहिं करत पयाना
Verse 6
अहह मंद मनु अवसर चूका अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका
Verse 7
मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई मनहँ कृपन धन रासि गवाँई
Verse 8
बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई चलेउ समर जनु सुभट पराई
Verse 9
बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति
Verse 10
जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति
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