Book 2 • Chapter 145
Section 145
10 verses
Verse 1
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी पतिदेवता करम मन बानी
Verse 2
रहै करम बस परिहरि नाहू सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु
Verse 3
लोचन सजल डीठि भइ थोरी सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी
Verse 4
सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी
Verse 5
बिबरन भयउ न जाइ निहारी मारेसि मनहुँ पिता महतारी
Verse 6
हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी जमपुर पंथ सोच जिमि पापी
Verse 7
बचनु न आव हृदयँ पछिताई अवध काह मैं देखब जाई
Verse 8
राम रहित रथ देखिहि जोई सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई
Verse 9
-धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि
Verse 10
उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि
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