Book 2 • Chapter 15
Section 15
10 verses
Verse 1
प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही
Verse 2
सुदिनु सुमंगल दायकु सोई तोर कहा फुर जेहि दिन होई
Verse 3
जेठ स्वामि सेवक लघु भाई यह दिनकर कुल रीति सुहाई
Verse 4
राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली देउँ मागु मन भावत आली
Verse 5
कौसल्या सम सब महतारी रामहि सहज सुभायँ पिआरी
Verse 6
मो पर करहिं सनेहु बिसेषी मैं करि प्रीति परीछा देखी
Verse 7
जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू होहुँ राम सिय पूत पुतोहू
Verse 8
प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें
Verse 9
भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ
Verse 10
हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ
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