Book 2 • Chapter 155
Section 155
10 verses
Verse 1
धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू
Verse 2
कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही
Verse 3
बिलपत राउ बिकल बहु भाँती भइ जुग सरिस सिराति न राती
Verse 4
तापस अंध साप सुधि आई कौसल्यहि सब कथा सुनाई
Verse 5
भयउ बिकल बरनत इतिहासा राम रहित धिग जीवन आसा
Verse 6
सो तनु राखि करब मैं काहा जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा
Verse 7
हा रघुनंदन प्रान पिरीते तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते
Verse 8
हा जानकी लखन हा रघुबर हा पितु हित चित चातक जलधर
Verse 9
राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम
Verse 10
तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम
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