Book 2 • Chapter 158
Section 158
10 verses
Verse 1
चले समीर बेग हय हाँके नाघत सरित सैल बन बाँके
Verse 2
हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई
Verse 3
एक निमेष बरस सम जाई एहि बिधि भरत नगर निअराई
Verse 4
असगुन होहिं नगर पैठारा रटहिं कुभाँति कुखेत करारा
Verse 5
खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला सुनि सुनि होइ भरत मन सूला
Verse 6
श्रीहत सर सरिता बन बागा नगरु बिसेषि भयावनु लागा
Verse 7
खग मृग हय गय जाहिं न जोए राम बियोग कुरोग बिगोए
Verse 8
नगर नारि नर निपट दुखारी मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी
Verse 9
पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं
Verse 10
भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं
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