Book 2 • Chapter 159
Section 159
10 verses
Verse 1
हाट बाट नहिं जाइ निहारी जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी
Verse 2
आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि
Verse 3
सजि आरती मुदित उठि धाई द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई
Verse 4
भरत दुखित परिवारु निहारा मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा
Verse 5
कैकेई हरषित एहि भाँति मनहुँ मुदित दव लाइ किराती
Verse 6
सुतहि ससोच देखि मनु मारें पूँछति नैहर कुसल हमारें
Verse 7
सकल कुसल कहि भरत सुनाई पूँछी निज कुल कुसल भलाई
Verse 8
कहु कहँ तात कहाँ सब माता कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता
Verse 9
सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन
Verse 10
भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन
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