Book 2 • Chapter 161
Section 161
10 verses
Verse 1
बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति मनहुँ जरे पर लोनु लगावति
Verse 2
तात राउ नहिं सोचे जोगू बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू
Verse 3
जीवत सकल जनम फल पाए अंत अमरपति सदन सिधाए
Verse 4
अस अनुमानि सोच परिहरहू सहित समाज राज पुर करहू
Verse 5
सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू पाकें छत जनु लाग अँगारू
Verse 6
धीरज धरि भरि लेहिं उसासा पापनि सबहि भाँति कुल नासा
Verse 7
जौं पै कुरुचि रही अति तोही जनमत काहे न मारे मोही
Verse 8
पेड़ काटि तैं पालउ सींचा मीन जिअन निति बारि उलीचा
Verse 9
हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ
Verse 10
जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ
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