Book 2 • Chapter 162
Section 162
10 verses
Verse 1
जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ
Verse 2
बर मागत मन भइ नहिं पीरा गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा
Verse 3
भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही
Verse 4
बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी सकल कपट अघ अवगुन खानी
Verse 5
सरल सुसील धरम रत राऊ सो किमि जानै तीय सुभाऊ
Verse 6
अस को जीव जंतु जग माहीं जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं
Verse 7
भे अति अहित रामु तेउ तोही को तू अहसि सत्य कहु मोही
Verse 8
जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई आँखि ओट उठि बैठहिं जाई
Verse 9
राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि
Verse 10
मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि
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