Book 2 • Chapter 163
Section 163
10 verses
Verse 1
सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई जरहिं गात रिस कछु न बसाई
Verse 2
तेहि अवसर कुबरी तहँ आई बसन बिभूषन बिबिध बनाई
Verse 3
लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई बरत अनल घृत आहुति पाई
Verse 4
हुमगि लात तकि कूबर मारा परि मुह भर महि करत पुकारा
Verse 5
कूबर टूटेउ फूट कपारू दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू
Verse 6
आह दइअ मैं काह नसावा करत नीक फलु अनइस पावा
Verse 7
सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी लगे घसीटन धरि धरि झोंटी
Verse 8
भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई कौसल्या पहिं गे दोउ भाई
Verse 9
मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार
Verse 10
कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार
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