Book 2 • Chapter 164
Section 164
10 verses
Verse 1
भरतहि देखि मातु उठि धाई मुरुछित अवनि परी झइँ आई
Verse 2
देखत भरतु बिकल भए भारी परे चरन तन दसा बिसारी
Verse 3
मातु तात कहँ देहि देखाई कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई
Verse 4
कैकइ कत जनमी जग माझा जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा
Verse 5
कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही अपजस भाजन प्रियजन द्रोही
Verse 6
को तिभुवन मोहि सरिस अभागी गति असि तोरि मातु जेहि लागी
Verse 7
पितु सुरपुर बन रघुबर केतू मैं केवल सब अनरथ हेतु
Verse 8
धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी दुसह दाह दुख दूषन भागी
Verse 9
मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि
Verse 10
लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि
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