Book 2 • Chapter 165
Section 165
10 verses
Verse 1
सरल सुभाय मायँ हियँ लाए अति हित मनहुँ राम फिरि आए
Verse 2
भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई सोकु सनेहु न हृदयँ समाई
Verse 3
देखि सुभाउ कहत सबु कोई राम मातु अस काहे न होई
Verse 4
माताँ भरतु गोद बैठारे आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे
Verse 5
अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू कुसमउ समुझि सोक परिहरहू
Verse 6
जनि मानहु हियँ हानि गलानी काल करम गति अघटित जानि
Verse 7
काहुहि दोसु देहु जनि ताता भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता
Verse 8
जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा अजहुँ को जानइ का तेहि भावा
Verse 9
पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर
Verse 10
बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर 165
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