Book 2 • Chapter 17
Section 17
10 verses
Verse 1
सादर पुनि पुनि पूँछति ओही सबरी गान मृगी जनु मोही
Verse 2
तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी रहसी चेरि घात जनु फाबी
Verse 3
तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ
Verse 4
सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली अवध साढ़साती तब बोली
Verse 5
प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी
Verse 6
रहा प्रथम अब ते दिन बीते समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते
Verse 7
भानु कमल कुल पोषनिहारा बिनु जल जारि करइ सोइ छारा
Verse 8
जरि तुम्हारि चह सवति उखारी रूँधहु करि उपाउ बर बारी
Verse 9
तुम्हहि न सोचु सोहाग बल निज बस जानहु राउ
Verse 10
मन मलीन मुह मीठ नृप राउर सरल सुभाउ
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