Book 2 • Chapter 18
Section 18
10 verses
Verse 1
चतुर गँभीर राम महतारी बीचु पाइ निज बात सँवारी
Verse 2
पठए भरतु भूप ननिअउरें राम मातु मत जानव रउरें
Verse 3
सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें गरबित भरत मातु बल पी कें
Verse 4
सालु तुम्हार कौसिलहि माई कपट चतुर नहिं होइ जनाई
Verse 5
राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी
Verse 6
रची प्रंपचु भूपहि अपनाई राम तिलक हित लगन धराई
Verse 7
यह कुल उचित राम कहुँ टीका सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका
Verse 8
आगिलि बात समुझि डरु मोही देउ दैउ फिरि सो फलु ओही
Verse 9
रचि पचि कोटिक कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु
Verse 10
कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु
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