Book 2 • Chapter 172
Section 172
10 verses
Verse 1
अस बिचारि केहि देइअ दोसू ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू
Verse 2
तात बिचारु केहि करहु मन माहीं सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं
Verse 3
सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना तजि निज धरमु बिषय लयलीना
Verse 4
सोचिअ नृपति जो नीति न जाना जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना
Verse 5
सोचिअ बयसु कृपन धनवानू जो न अतिथि सिव भगति सुजानू
Verse 6
सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी
Verse 7
सोचिअ पुनि पति बंचक नारी कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी
Verse 8
सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई जो नहिं गुर आयसु अनुसरई
Verse 9
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग
Verse 10
सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग
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