Book 2 • Chapter 173
Section 173
9 verses
Verse 1
बैखानस सोइ सोचै जोगु तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू
Verse 2
सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी जननि जनक गुर बंधु बिरोधी
Verse 3
सब बिधि सोचिअ पर अपकारी निज तनु पोषक निरदय भारी
Verse 4
सोचनीय सबहि बिधि सोई जो न छाड़ि छलु हरि जन होई
Verse 5
सोचनीय नहिं कोसलराऊ भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ
Verse 6
भयउ न अहइ न अब होनिहारा भूप भरत जस पिता तुम्हारा
Verse 7
बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा
Verse 8
कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु
Verse 9
राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु
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