Book 2 • Chapter 193
Section 193
10 verses
Verse 1
लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ
Verse 2
अस कहि भेंट सँजोवन लागे कंद मूल फल खग मृग मागे
Verse 3
मीन पीन पाठीन पुराने भरि भरि भार कहारन्ह आने
Verse 4
मिलन साजु सजि मिलन सिधाए मंगल मूल सगुन सुभ पाए
Verse 5
देखि दूरि तें कहि निज नामू कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू
Verse 6
जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा
Verse 7
राम सखा सुनि संदनु त्यागा चले उतरि उमगत अनुरागा
Verse 8
गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई कीन्ह जोहारु माथ महि लाई
Verse 9
करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ
Verse 10
मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ
0:000:00
Speed: