Book 2 • Chapter 216
Section 216
10 verses
Verse 1
कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा
Verse 2
रिषि आयसु असीस सिर राखी करि दंडवत बिनय बहु भाषी
Verse 3
पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें
Verse 4
रामसखा कर दीन्हें लागू चलत देह धरि जनु अनुरागू
Verse 5
नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया
Verse 6
लखन राम सिय पंथ कहानी पूँछत सखहि कहत मृदु बानी
Verse 7
राम बास थल बिटप बिलोकें उर अनुराग रहत नहिं रोकैं
Verse 8
दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला भइ मृदु महि मगु मंगल मूला
Verse 9
किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात
Verse 10
तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात
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