Book 2 • Chapter 217
Section 217
10 verses
Verse 1
जड़ चेतन मग जीव घनेरे जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे
Verse 2
ते सब भए परम पद जोगू भरत दरस मेटा भव रोगू
Verse 3
यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं
Verse 4
बारक राम कहत जग जेऊ होत तरन तारन नर तेऊ
Verse 5
भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता कस न होइ मगु मंगलदाता
Verse 6
सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं
Verse 7
देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू
Verse 8
गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई रामहि भरतहि भेंट न होई
Verse 9
रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि
Verse 10
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि
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