Book 2 • Chapter 218
Section 218
9 verses
Verse 1
बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने सहसनयन बिनु लोचन जाने
Verse 2
मायापति सेवक सन माया करइ त उलटि परइ सुरराया
Verse 3
तब किछु कीन्ह राम रुख जानी अब कुचालि करि होइहि हानी
Verse 4
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ निज अपराध रिसाहिं न काऊ
Verse 5
जो अपराधु भगत कर करई राम रोष पावक सो जरई
Verse 6
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा यह महिमा जानहिं दुरबासा
Verse 7
भरत सरिस को राम सनेही जगु जप राम रामु जप जेही
Verse 8
मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु
Verse 9
अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु
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