Book 2 • Chapter 238
Section 238
10 verses
Verse 1
सखा बचन सुनि बिटप निहारी उमगे भरत बिलोचन बारी
Verse 2
करत प्रनाम चले दोउ भाई कहत प्रीति सारद सकुचाई
Verse 3
हरषहिं निरखि राम पद अंका मानहुँ पारसु पायउ रंका
Verse 4
रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं
Verse 5
देखि भरत गति अकथ अतीवा प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा
Verse 6
सखहि सनेह बिबस मग भूला कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला
Verse 7
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे सहज सनेहु सराहन लागे
Verse 8
होत न भूतल भाउ भरत को अचर सचर चर अचर करत को
Verse 9
पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर
Verse 10
मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर
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