Book 2 • Chapter 240
Section 240
10 verses
Verse 1
सानुज सखा समेत मगन मन बिसरे हरष सोक सुख दुख गन
Verse 2
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई भूतल परे लकुट की नाई
Verse 3
बचन सपेम लखन पहिचाने करत प्रनामु भरत जियँ जाने
Verse 4
बंधु सनेह सरस एहि ओरा उत साहिब सेवा बस जोरा
Verse 5
मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई सुकबि लखन मन की गति भनई
Verse 6
रहे राखि सेवा पर भारू चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू
Verse 7
कहत सप्रेम नाइ महि माथा भरत प्रनाम करत रघुनाथा
Verse 8
उठे रामु सुनि पेम अधीरा कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा
Verse 9
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान
Verse 10
भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान
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