Book 2 • Chapter 243
Section 243
10 verses
Verse 1
सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू सिय समीप राखे रिपुदवनू
Verse 2
चले सबेग रामु तेहि काला धीर धरम धुर दीनदयाला
Verse 3
गुरहि देखि सानुज अनुरागे दंड प्रनाम करन प्रभु लागे
Verse 4
मुनिबर धाइ लिए उर लाई प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई
Verse 5
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू
Verse 6
रामसखा रिषि बरबस भेंटा जनु महि लुठत सनेह समेटा
Verse 7
रघुपति भगति सुमंगल मूला नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला
Verse 8
एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं
Verse 9
जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ
Verse 10
सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ
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