Book 2 • Chapter 251
Section 251
8 verses
Verse 1
तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे सेवा जोगु न भाग हमारे
Verse 2
देब काह हम तुम्हहि गोसाँई ईधनु पात किरात मिताई
Verse 3
यह हमारि अति बड़ि सेवकाई लेहि न बासन बसन चोराई
Verse 4
हम जड़ जीव जीव गन घाती कुटिल कुचाली कुमति कुजाती
Verse 5
पाप करत निसि बासर जाहीं नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं
Verse 6
सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ
Verse 7
जब तें प्रभु पद पदुम निहारे मिटे दुसह दुख दोष हमारे
Verse 8
बचन सुनत पुरजन अनुरागे तिन्ह के भाग सराहन लागे
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