Book 2 • Chapter 252
Section 252
10 verses
Verse 1
पुर जन नारि मगन अति प्रीती बासर जाहिं पलक सम बीती
Verse 2
सीय सासु प्रति बेष बनाई सादर करइ सरिस सेवकाई
Verse 3
लखा न मरमु राम बिनु काहूँ माया सब सिय माया माहूँ
Verse 4
सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं
Verse 5
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई कुटिल रानि पछितानि अघाई
Verse 6
अवनि जमहि जाचति कैकेई महि न बीचु बिधि मीचु न देई
Verse 7
लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं राम बिमुख थलु नरक न लहहीं
Verse 8
यहु संसउ सब के मन माहीं राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं
Verse 9
निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच
Verse 10
नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच
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