Book 2 • Chapter 258
Section 258
10 verses
Verse 1
आरत कहहिं बिचारि न काऊ सूझ जूआरिहि आपन दाऊ
Verse 2
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ
Verse 3
सब कर हित रुख राउरि राखें आयसु किएँ मुदित फुर भाषें
Verse 4
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई माथें मानि करौ सिख सोई
Verse 5
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं
Verse 6
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा भरत सनेहँ बिचारु न राखा
Verse 7
तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी भरत भगति बस भइ मति मोरी
Verse 8
मोरें जान भरत रुचि राखि जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी
Verse 9
भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि
Verse 10
करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि
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