Book 2 • Chapter 260
Section 260
10 verses
Verse 1
सुनि मुनि बचन राम रुख पाई गुरु साहिब अनुकूल अघाई
Verse 2
लखि अपने सिर सबु छरु भारू कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू
Verse 3
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें नीरज नयन नेह जल बाढ़ें
Verse 4
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा एहि तें अधिक कहौं मैं काहा
Verse 5
मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ अपराधिहु पर कोह न काऊ
Verse 6
मो पर कृपा सनेह बिसेषी खेलत खुनिस न कबहूँ देखी
Verse 7
सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू
Verse 8
मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही हारेहुँ खेल जितावहिं मोही
Verse 9
महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन
Verse 10
दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन
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