Book 2 • Chapter 261
Section 261
10 verses
Verse 1
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा नीच बीचु जननी मिस पारा
Verse 2
यहउ कहत मोहि आजु न सोभा अपनीं समुझि साधु सुचि को भा
Verse 3
मातु मंदि मैं साधु सुचाली उर अस आनत कोटि कुचाली
Verse 4
फरइ कि कोदव बालि सुसाली मुकुता प्रसव कि संबुक काली
Verse 5
सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू मोर अभाग उदधि अवगाहू
Verse 6
बिनु समुझें निज अघ परिपाकू जारिउँ जायँ जननि कहि काकू
Verse 7
हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा
Verse 8
गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू लागत मोहि नीक परिनामू
Verse 9
साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ
Verse 10
प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ
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