Book 2 • Chapter 262
Section 262
10 verses
Verse 1
भूपति मरन पेम पनु राखी जननी कुमति जगतु सबु साखी
Verse 2
देखि न जाहि बिकल महतारी जरहिं दुसह जर पुर नर नारी
Verse 3
महीं सकल अनरथ कर मूला सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला
Verse 4
सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा करि मुनि बेष लखन सिय साथा
Verse 5
बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ
Verse 6
बहुरि निहार निषाद सनेहू कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू
Verse 7
अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई जिअत जीव जड़ सबइ सहाई
Verse 8
जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी
Verse 9
तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि
Verse 10
तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि
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