Book 2 • Chapter 265
Section 265
10 verses
Verse 1
सुर गन सहित सभय सुरराजू सोचहिं चाहत होन अकाजू
Verse 2
बनत उपाउ करत कछु नाहीं राम सरन सब गे मन माहीं
Verse 3
बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं रघुपति भगत भगति बस अहहीं
Verse 4
सुधि करि अंबरीष दुरबासा भे सुर सुरपति निपट निरासा
Verse 5
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा नरहरि किए प्रगट प्रहलादा
Verse 6
लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा अब सुर काज भरत के हाथा
Verse 7
आन उपाउ न देखिअ देवा मानत रामु सुसेवक सेवा
Verse 8
हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि निज गुन सील राम बस करतहि
Verse 9
सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु
Verse 10
सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु
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