Book 2 • Chapter 266
Section 266
10 verses
Verse 1
सीतापति सेवक सेवकाई कामधेनु सय सरिस सुहाई
Verse 2
भरत भगति तुम्हरें मन आई तजहु सोचु बिधि बात बनाई
Verse 3
देखु देवपति भरत प्रभाऊ सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ
Verse 4
मन थिर करहु देव डरु नाहीं भरतहि जानि राम परिछाहीं
Verse 5
सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू अंतरजामी प्रभुहि सकोचू
Verse 6
निज सिर भारु भरत जियँ जाना करत कोटि बिधि उर अनुमाना
Verse 7
करि बिचारु मन दीन्ही ठीका राम रजायस आपन नीका
Verse 8
निज पन तजि राखेउ पनु मोरा छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा
Verse 9
कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ
Verse 10
करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ
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