Book 2 • Chapter 267
Section 267
10 verses
Verse 1
कहौं कहावौं का अब स्वामी कृपा अंबुनिधि अंतरजामी
Verse 2
गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला मिटी मलिन मन कलपित सूला
Verse 3
अपडर डरेउँ न सोच समूलें रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें
Verse 4
मोर अभागु मातु कुटिलाई बिधि गति बिषम काल कठिनाई
Verse 5
पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला प्रनतपाल पन आपन पाला
Verse 6
यह नइ रीति न राउरि होई लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई
Verse 7
जगु अनभल भल एकु गोसाईं कहिअ होइ भल कासु भलाईं
Verse 8
देउ देवतरु सरिस सुभाऊ सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ
Verse 9
जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच
Verse 10
मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच
0:000:00
Speed: