Book 2 • Chapter 269
Section 269
10 verses
Verse 1
नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई बहुरिअ सीय सहित रघुराई
Verse 2
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई करुना सागर कीजिअ सोई
Verse 3
देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु मोरें नीति न धरम बिचारु
Verse 4
कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू रहत न आरत कें चित चेतू
Verse 5
उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई सो सेवकु लखि लाज लजाई
Verse 6
अस मैं अवगुन उदधि अगाधू स्वामि सनेहँ सराहत साधू
Verse 7
अब कृपाल मोहि सो मत भावा सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा
Verse 8
प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ जग मंगल हित एक उपाऊ
Verse 9
प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब
Verse 10
सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब
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