Book 2 • Chapter 270
Section 270
10 verses
Verse 1
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे साधु सराहि सुमन सुर बरषे
Verse 2
असमंजस बस अवध नेवासी प्रमुदित मन तापस बनबासी
Verse 3
चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची प्रभु गति देखि सभा सब सोची
Verse 4
जनक दूत तेहि अवसर आए मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए
Verse 5
करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे बेषु देखि भए निपट दुखारे
Verse 6
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता कहहु बिदेह भूप कुसलाता
Verse 7
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा बोले चर बर जोरें हाथा
Verse 8
बूझब राउर सादर साईं कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं
Verse 9
नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ
Verse 10
मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ
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