Book 2 • Chapter 272
Section 272
10 verses
Verse 1
दूतन्ह आइ भरत कइ करनी जनक समाज जथामति बरनी
Verse 2
सुनि गुर परिजन सचिव महीपति भे सब सोच सनेहँ बिकल अति
Verse 3
धरि धीरजु करि भरत बड़ाई लिए सुभट साहनी बोलाई
Verse 4
घर पुर देस राखि रखवारे हय गय रथ बहु जान सँवारे
Verse 5
दुघरी साधि चले ततकाला किए बिश्रामु न मग महीपाला
Verse 6
भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा चले जमुन उतरन सबु लागा
Verse 7
खबरि लेन हम पठए नाथा तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा
Verse 8
साथ किरात छ सातक दीन्हे मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे
Verse 9
सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु
Verse 10
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु
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