Book 2 • Chapter 275
Section 275
10 verses
Verse 1
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा
Verse 2
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं
Verse 3
राम दरस लालसा उछाहू पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू
Verse 4
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही
Verse 5
आवत जनकु चले एहि भाँती सहित समाज प्रेम मति माती
Verse 6
आए निकट देखि अनुरागे सादर मिलन परसपर लागे
Verse 7
लगे जनक मुनिजन पद बंदन रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन
Verse 8
भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि चले लवाइ समेत समाजहि
Verse 9
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु
Verse 10
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु
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